गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल आस्ताना रहीमियां

//गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल आस्ताना रहीमियां

गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल आस्ताना रहीमियां

हज़रत रहीम शाह बाबा भर दे झोली मेरी…

डा. शाह मेराज

वाराणसी/दिल इंडिया लाइव

औलियाओं के दर पर हाज़िरी देने वाले चाहे हिन्दू हो या फिर मुसलमान मगर जब वह दरे औलिया पर पहुंचते हैं तो उनका सबसे बड़ा मजहब हो जाता है इंसानियत और मोहब्बत का। तभी तो जो भी चाहता है औलियाओं के दर पर हाज़िरी लगाकर अपनी मुराद और मन्नते पूरी करा लेता है। इन आस्तानों से झोली भर कर यहां से हर साल सैकड़ों लोग अपने घर हंसी खुशी लौटते हैं। ऐसा ही एक मरकज़ आस्ताना रहीमिया बनारस के बेनियाबाग के पास मौजूद है। इस दर से लोगों को खास अकीदत है। यूपी ही नहीं बल्कि इस दर पर उर्स के दौरान देश के कोने-कोने से जायरीन मुराद लेकर अपनी झोली फैलाये पहुंचते हैं। आस्ताने के सज्जादानशीन मोहम्मद सैफ रहीमी बताते हैं कि बाबा रहीम शाह अपने दौर के पहुंचे हुए वली थे। वह गाजीपुर से पीर की तलाश में भटकते हुए बनारस पहुंचे और गंगा किनारे रामनगर में उस दौर के सूफी-संतों के साथ दीन और मुल्क की खिदमत में जुट गये।

रहीम शाह की दुआओं में था असर 

बुज़ुर्गो की माने तो हज़रत रहीम शाह की दुआओं में इतना असर था कि वह जिसे भी दुआ दे देते थे उसकी खुदा किस्मत संवार देता था। उनके करिश्मों का क्या पूछना। हजरत एक वक्त में 11 महफि़लों में मिलाद पढ़ाते थे। इनकी दुआओं से अनगिनत लोगों को औलाद का सुख मिला। लोगों की मनचाही मुरादें पूरी हुई। शैतान, भूत-प्रेत जैसी परेशानियों से लोगों को निजात मिली। उनके पर्दा करने के बाद भी अस्ताने पर लोग मन्नते मांगकर अपनी मुराद पूरी करते हैं। दरअसल 1252 हिजरी में गाजीपुर में पैदा हुए अब्दुल रहीम शाह बाबा रहमतुल्लाह अलैह की पहचान पैदाइश से कुछ दिनों बाद ही करिश्मों के चलते सूफियों में होने लगी जो उम्र के साथ मशहूर सूफी संतो में शुमार हो गये। खास बात यह थी कि इन करिश्मों के लिए हजरत रहीम शाह बाबा ने बनारस को ही अपनी तपो स्थली बनाई और वह ताउम्र यहीं के होकर रह गये। सुबह सहर के वक्त 1348 हिजरी के दिन आपने रामनगर में दुनिया से हमेशा के लिए पर्दाकर लिया। उस वक्त आपका आस्ताना बेनियाबाग में बना जहां आज भी आप न सिर्फ तशरीफ फरमां हैं बल्कि सभी की मन्नतें और मुराद भी पूरी कर रहे हैं।

उर्स अकीदत के साथ मनाया गया

हजरत रहीम शाह बाबा के तीन दिवसीय उर्स में सभी धर्म और मजहब के लोग बिना किसी मजहबी झगड़ो के बाबा के दर पर फैज उठाते दिखाई दिये। बेनिया  स्थित रहीमी दरबार सूफीयाना कलाम से गूंज रहा था। सुबह पाक कुरान की तेलावत से शुरु हुए उर्स में देश के कोने कोने से जायरीन पहुचे हुए थे, चादर-गागर का जब जुलूस निकला तो उसका बोसा लेने और जियारत की लोगों में होड़ सी लग गई। चादर का जुलूस जब आस्ताने पहुुुंचा तो मगरिब की नमाज के बाद चादरपोशी की गईं। बाबा के दर पर सरकारी चादरके साथ ही मन्नती चादर चढाने भी लोगों का रेला लगा था। उर्स के मौके पर हजरत रहीम शाह बाबा की दरगाह शरीफ पर  कव्वाली,महफिले शमा,चादरपोशी एवं लंगर में हिंदू एवं मुस्लिम का हुजूम दरगाह परिसर के पास देखा गया। दरगाह परिसर को लाइटो एवं  झालरों से सजाया गया । दरगाह रहीम शाह की गद्दी के सरपरस्त मोहम्मद शाहिद उर्फ काजू ने बताया कि हजरत रहीम शाह बाबा के चाहने वाले काफी दूर दूर से यहां आते हैं उनके लिए वाराणसी के कई होटलों एवं मुसाफिर खानों में रूम बुक किए जाते है और पूरी जिम्मेदारियों के साथ उर्स मुबारक खत्म होने तक मेहमानों के लिए रहने का  सारा इन्तेजमात किया जाता है। 

By |2020-02-05T06:25:15+00:00February 5th, 2020|आस्था\पर्व|2 Comments

About the Author:

I started my career as a journalist in August 1999 with the Hindi daily Sanmarg. This letter of Dharmasangha gave me a strong identity. From October 2007 to 2010, I worked in Amar Ujala and Compact and spread across the country. When the Rashtriya Sahara Varanasi unit was launched, I was called there and from October 2010 to March 2019 I was part of this unit. Today when the world started changing, things started going digital, so I started my career as an editor in digital media with Dil India Live. This platform of mine does not work nor receive financial help from any political party, spokesperson of any social or religious organization. मैंने बतौर पत्रकार कैरियर कि शुरुआत अगस्त 1999 में हिन्दी दैनिक सन्मार्ग से किया था। धर्मसंघ के इस पत्र से मुझे मज़बूत पहचान मिली। अक्टूबर 2007 से 2010 तक मैंने अमर उजाला और काम्पैक्ट में काम किया और देश भर में छा गया। राष्ट्रीय सहारा वाराणसी यूनिट लांच हुई तो मुझे बुलाया गया वहा अक्टूबर 2010 से मार्च 2019 तक मैं इस यूनिट का हिस्सा था। आज जब दुनिया में बद्लाव शुरू हुआ, चीज़े डिज़िटल होने लगी तो मैं भी डिज़िटल मीडिया में बतौर सम्पादक अपने कैरियर कि नई शुरूआत दिल इंडिया लाइव के साथ की। मेरा यह प्लेट्फार्म किसी सियासी दल, किसी सामजिक या धार्मिक संगठन का प्रवक्ता बन कर न तो काम करता है और न ही किसी से आर्थिक मदद प्राप्त करता है।

2 Comments

  1. Imtiyaz khan February 5, 2020 at 8:39 am

    Masha Allah

  2. Imtiyaz khan February 5, 2020 at 8:45 am

    Bahot sahi kaha aapne mujhe bhi bahot faiz hasil hua hai haji abdul rahim sha ke dar se

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