दो दशक से रोज़ा रख रहे हैं काशी के ये कुमार

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दो दशक से रोज़ा रख रहे हैं काशी के ये कुमार

सौहार्द की कहानी लिख रहे हैं काशी के संतोष

Varanasi/Dil India Live (अमन)

काशी में सौहार्द का बदला हुआ नाम अगर संतोष कह दिया जाये तो गलत नहीं होगा। हज़रत बिजली शहीद दरगाह के खादिम संतोष कुमार हिन्दू होते हुए भी पिछले दो दशक से रोज़ा रख रहे हैं। मुस्लिम तो रमज़ान में 30 रोज़ा रखते हैं मगर संतोष रमज़ान के 30 रोज़े के अतिरिक्त 6 नफ्ल रोज़ा भी रहकर काशी की गंगा जमुनी तहज़ीब को मज़बूत करते 1996 से चले आ रहे हैं। संतोष वारसी की खिदमत से मोतासिर होकर नदेसर के मोहम्मद शाहिद खां कहते हैं कि जो दौर नफरतों के कारोबार के नाम पर जाना जाता है, वहां संतोष वारसी जैसे लोग ही है जो बनारस को बचाये हुए हैं। जब तक संतोष जैसे लोग रहेंगे बनारस मिल्लत का मरकज़ बना रहेगा।

संतोष बताते हैं कि वो हर साल अलविदा की नमाज़ देवा शरीफ में अदा करते हैं, रोज़ा रखकर देवा शरीफ बनारस से रवाना होते हैं, रास्ते में रोज़ा खोलते हैं और देवा शरीफ में नमाज़ अदा करके वापस बनारस लौटते हैं। देशभर की खानकाहों और आस्तानों पर हाज़िरी लगाने वाले संतोष इस सवाल पर कि हिन्दू होते हुए भी रमज़ान का रोज़ा रखने से आपके घर वाले और रिश्तेदारों ने मना नहीं किया? इस पर वो कहते हैं कि रमज़ान का रोज़ा रखने या नमाज़ पढ़ने से किसी ने मना नहीं किया बल्कि लोगों का सपोर्टही मुझे मिला। संतोष वारसी बताते हैं कि वो हर रमज़ान में छह दिन की तरावीह का आयोजन दरगाह बिजली शहीद में करते हैं तो 20 रमज़ान को रोज़ा इफ्तार व शबीना कराते हैं। 10 मोहर्रम को कुरानख्वानी के साथ ही खिचड़े की फातेहा कराते हैं। हर साल उनकी अगुवाईमें हज़रत बिजली शहीद का उर्स मनाया जाता है। वो कहते हैं कि हिन्दू-मुस्लिम बटे कभी नहीं थे मगर सियासत ने लोगों को बांट कर, अपना उल्लू सीधा करना शुरू कर दिया, यही वजह हैकि आज दोनों भाईयों के बीच नफरत फैली हुई है। मैं हमेशा दुआ करता हूं कि मेरे मुल्क से नफरत का खात्मा हो जाये और देश हमारा तरक्की करें, सब मिल्लत के साथ रहें।

बिजली शहीद आस्ताने के खादिम संतोष

बिजली शहीद बाबा के आस्ताने के खादिम संतोष वारसी लम्बे समय से बाबा की खिदमत में लगे हुए है। संतोष उन लोगों के लिए मिसाल है जो हिन्दू धर्म की भी इज्जत करते हैं और मुस्लिमों के प्रमुख तीज त्योहार को भी मनाते हैं। साल में 36 दिन रोज़ा रखने वाले संतोष पर रमज़ान का रंग चांद होते ही दिखाई देने लगता है तो ईद की खुशियां भी उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती है। इन्हें देखते ही नज़ीर बनारसी का कलाम, मेरी एक आंख गंगा, मेरी एक आंख यमुना, मेरा दिल है एक संगम जिसे पूजना हो आये..ज़ेहन में ताजा हो जाता है। इस वक्त संतोष बस यही दुआ कर रहे है कि या लोगो को सही राह दिखा और खुदा तू कोरोना को इस दुनिया से खात्म कर दे, इस बीमारी कि जो भी गिरफ्त में हैं उन्हे तू शिफा दे…आमीन।

By |2020-05-20T14:13:30+00:00May 20th, 2020|मिसाल|Comments Off on दो दशक से रोज़ा रख रहे हैं काशी के ये कुमार

About the Author:

I started my career as a journalist in August 1999 with the Hindi daily Sanmarg. This letter of Dharmasangha gave me a strong identity. From October 2007 to 2010, I worked in Amar Ujala and Compact and spread across the country. When the Rashtriya Sahara Varanasi unit was launched, I was called there and from October 2010 to March 2019 I was part of this unit. Today when the world started changing, things started going digital, so I started my career as an editor in digital media with Dil India Live. This platform of mine does not work nor receive financial help from any political party, spokesperson of any social or religious organization. मैंने बतौर पत्रकार कैरियर कि शुरुआत अगस्त 1999 में हिन्दी दैनिक सन्मार्ग से किया था। धर्मसंघ के इस पत्र से मुझे मज़बूत पहचान मिली। अक्टूबर 2007 से 2010 तक मैंने अमर उजाला और काम्पैक्ट में काम किया और देश भर में छा गया। राष्ट्रीय सहारा वाराणसी यूनिट लांच हुई तो मुझे बुलाया गया वहा अक्टूबर 2010 से मार्च 2019 तक मैं इस यूनिट का हिस्सा था। आज जब दुनिया में बद्लाव शुरू हुआ, चीज़े डिज़िटल होने लगी तो मैं भी डिज़िटल मीडिया में बतौर सम्पादक अपने कैरियर कि नई शुरूआत दिल इंडिया लाइव के साथ की। मेरा यह प्लेट्फार्म किसी सियासी दल, किसी सामजिक या धार्मिक संगठन का प्रवक्ता बन कर न तो काम करता है और न ही किसी से आर्थिक मदद प्राप्त करता है।